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या मुझे अफ़सर-ए-शाहा न बनाया होता

Wednesday, September 3, 2008

या मुझे अफ़सर-ए-शाहा न बनाया होता
या मेरा ताज गड़ाया न बनाया होता

खाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे
काश ख़ाक-ए-दर-ए-जानाँ न बनाया होता

नशा-ए-इश्क का गर ज़र्फ़ दिया था मुझ को
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता

अपना दीवाना बनाया मुझे होता तूने
क्यों खिरदमंद बनाया न बनाया होता

शोला-ए-हुस्न चमन में न दिखाया उस ने
वरना बुलबुल को भी परवाना बनाया होता

रोज़-ए-मामूरा-ए-दुनिया में खराबी है 'ज़फर'
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता

-ज़फर

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पास-ऐ-मार्ग मेरे मज़ार पर

पास--मार्ग मेरे मज़ार पर जो चिराग किसी ने जला दिया
उसे आह दामन--बाद ने सरे शाम ही से बुझा दिया

मुझे दफन करना तू जिस घड़ी तो ये उस से कहना की परी
वो जो तेरा आशिक--ज़ार था तह--ख़ाक उसे दबा दिया

दम--गुस्ल से मेरे पेश्तर उसे हमदमों ने ये सोच कर
कहीं जावे उस का दिल दहल मेरी लाश पर से हटा दिया

मेरी आँख झपकी थी एक पल मेरे दिल ने चाहा की उठ के चल
दिल--बेकरार ने मियाँ वहीं चुटकी लेके जगा दिया

ज़रा उन की शोखी तो देखिये लिए जुल्फ--खमशुदा हाथ में
मेरे पीछे आए दबे-दबे मुझे साँप कह के डरा दिया

मैं ने दिल दिया मैं ने जान दी मगर आह! तूने कद्र की
किसी बात को जो कहा कभी उसे चुटकियों में उड़ा दिया

-ज़फर

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लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ऐ-नापायेदार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ऐ-दागदार में

उम्र-ऐ-दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन
दो आरजू में कट गए दो इंतज़ार में

कितना है बदनसीब "ज़फर" दफन के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कू-ऐ-यार में

-ज़फर

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हमने दुनिया में आके क्या देखा

हमने दुनिया में आके क्या देखा
देखा जो कुछ सो ख्वाब-सा देखा

है तो इंसान ख़ाक का पुतला
लेक पानी का बुलबुला देखा

खूब देखा जहाँ के खूबान को
एक तुझ सा न दूसरा देखा

एक दम पर हवा न बाँध हबाब
दम को दम भर में यां हवा देखा

न हुए तेरी ख़ाक-ऐ-पा हम ने
ख़ाक में आप को मिला देखा

अब न दीजिये "ज़फर" किसी को दिल
की जिसे देखा बेवफा देखा

-ज़फर

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बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी

मेहँदी हसन साब की आवाज़ में बहादुर शाह ज़फर की बेहतरीन नज़्म -



बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो  थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो थी

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र--करार
बेक़रारी तुझेदिल कभी ऐसी तो थी

चश्म--कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हो गई कातिल कभी ऐसी तो थी

उन की आंखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी माइल कभी ऐसी तो थी

अक्स--रुख--यार ने किस से है तुझे चमकाया
ताब तुझ में माह--कामिल कभी ऐसी तो थी

क्या सबब तू जो बिगड़ता है "ज़फर" से हर बार
खू तेरी हूर--शमाइल कभी ऐसी तो थी

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तुम न आए ...

Monday, September 1, 2008

तुम न आए एक दिन का वादा कर दो दिन तलक
हम पड़े तडपा किए दो दो पहर दो दो दिन तलक

दर्द-ऐ-दिल अपना सुनाता हूँ कभी जो एक दिन
रहता है उस नाज़नीन को दर्द-ऐ-सर दो दिन तलक

देखते हैं ख्वाब में जिस दिन किसू की चश्म-ऐ-मस्त
रहते हैं हम दो जहाँ से बेखबर दो दिन तलक

गर यकीन हो ये हमें आएगा तू दो दिन के बाद
तो जियें हम और इस उम्मीद पर दो दिन तलक

क्या सबब क्या वास्ता क्या काम था बतलाइये
घर से जो निकले न अपने तुम "ज़फ़र" दो दिन तलक

-ज़फ़र

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यार था, गुलज़ार था ...

यार था, गुलज़ार था बाद-ऐ-सबा थी मैं न था
लायक-ऐ-पाबोस-ऐ-जान क्या हिना थी मैं न था

हाथ क्यों बंधे मेरे छल्ला अगर चोरी हुआ
ये सरापा शोखी-ऐ-रंग-ऐ-हिना थी मैं न था

मैंने पूछा क्या हुआ वो आप क्या हुस्न-ओ-शबाब
हंस के बोला वो सनम शान-ऐ-खुदा थी मैं न था

मैं सिसकता रह गया और मर गए फरहाद-ओ-कैस
क्या उन्हीं दोनों के हिस्से में कज़ा थी मैं न था

-जफ़र

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क्या मिलेगा यहाँ ?

यहाँ आपको मशहूर शायरों की बेहतरीन नज़में पढने को मिलेंगीइस जगह का मकसद उन बेशुमार नगीनों पे ज़िक्र करना और उनको बेहतर तरीके से समझना हैजहाँ भी मुमकिन है, वहाँ ग़ज़ल को संगीत के साथ पेश किया गया है

बेहतरीन

जब हम चले तो साया भी अपना न साथ दे
जब तुम चलो, ज़मीन चले आसमान चले
जब हम रुके साथ रुके शाम-ऐ-बेकसी
जब तुम रुको, बहार रुके चांदनी रुके
-जलील मानकपुरी

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