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कब वो सुनता है कहानी मेरी

Tuesday, November 11, 2008

नज़्म - मिर्जा ग़ालिब
कब वो सुनता है कहानी मेरी
और फिर वो भी ज़बानी मेरी

ख़लिशे-गमजा-ए-खूँरेज़ ना पूछ
देख खुनबफ़िशानी मेरी

क्या बयाँ करके मेरा रोएँगे यार
मगर अशुफ़्ता-बयानी मेरी

हूँ ज़िखुद रफ़्ता-ए-बैदा-ए-ख़्याल
भूल जाना है निशानी मेरी

मुत्काबिल है मुक़ाबिल मेरा
रुक गया देख रवानी मेरी

क़द्रे-संगे-सरे-राह रखता हूँ
सख़्त अर्ज़ान है गिरानी मेरी

दहन उसका जो न मालूम हुआ
खुल गयी है चमनदानी मेरी

कर दिया ज़ौफ़ ने अज़ीज़ "ग़ालिब"
नंगे-पीरी है जवानी मेरी

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न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही

नज़्म - मिर्जा ग़ालिब
न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही
इम्तिहाँ और भी बाक़ी हो तो ये भी न सही

ख़ार-ख़ार-ए-अलम-ए-हसरत-ए-दीदार तो है
शौक़ गुलचीन-ए-गुलिस्तान-ए-तसल्ली न सही

मय परस्ताँ ख़ुम-ए-मय मुँह से लगाये ही बने
एक दिन गर न हुआ बज़्म में साक़ी न सही

नफ़ज़-ए-क़ैस के है चश्म-ओ-चराग़-ए-सहरा
गर नहीं शम-ए-सियहख़ाना-ए-लैला न सही

एक हंगामे पे मौकूफ़ है घर की रौनक
नोह-ए-ग़म ही सही, नग़्मा-ए-शादी न सही

न सिताइश की तमन्ना न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशार में माने न सही

इशरत-ए-सोहबत-ए-ख़ुबाँ ही ग़नीमत समझो
न हुई "ग़ालिब" अगर उम्र-ए-तबीई न सही

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वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ

Tuesday, September 30, 2008

नज़्म - मिर्जा ग़ालिब
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ
वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहाँ

फ़ुर्सत-ए-कारोबार-ए-शौक़ किसे
ज़ौक़-ए-नज़ारा-ए-जमाल कहाँ
[ज़ौक़ : delight]

दिल तो दिल वो दिमाग़ भी न रहा
शोर-ए-सौदा-ए-ख़त-ओ-ख़ाल कहाँ

थी वो इक शख्स के तसव्वुर से
अब वो रानाई-ए-ख़याल कहाँ
[रानाई--ख़याल : tender thoughts]

ऐसा आसाँ नहीं लहू रोना
दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ

हमसे छूटा क़िमारख़ाना-ए-इश्क़
वाँ जो जायेँ गिरह में माल कहाँ
[किमारखाना : casino]

फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ

मुज़महिल हो गये क़ुवा "ग़ालिब"
वो अनासिर में ऐतदाल कहाँ
[मुज़महिल : lethargic; क़ुवा : powers; अनासीर : elements; ऐतदाल : moderation]

Jagjit Singh साब की आवाज़ में सुनिए -


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आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

Saturday, September 27, 2008

मिर्जा ग़ालिब की लिखी एक और नज़्म जगजीत सिंह की रेशमी आवाज़ में पेश-ऐ-खिदमत है -



आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक

दाम हर मौज में है हल्क़ा-ऐ-साद-ऐ-नहंग
देखें क्या गुज़रे है कतरे पे गौहर होने तक
[दाम : trap; हल्क़ा : ring; साद : hundred; नहंग : crocodile; गौहर : pearl]

आशिकी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूं खून-ऐ-जिगर होने तक

हम ने माना के तगाफुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक
[तगाफुल : neglect]

परतव-ऐ-खूर से है शबनम को फना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक
[परतव--खूर : sun rays;]

यक नज़र बेश नहीं फुर्सत-ऐ-हस्ती गाफिल
गरमी-ऐ-बज्म है इक रक्स-ऐ-शरार होने तक
[बेश : excess; गाफिल : ignorant;]

गम-ऐ-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्मा हर रंग में जलती है सहर होने तक
[जुज़ : other than; मर्ग : डेथ]

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हजारों ख्वाहिशें ऐसी

मिर्जा ग़ालिब की कलम से निकली एक बेहद ही खूबसूरत नज़्म, जी चाहता है कि बस अशार और निकलते रहे और हम यूँ ही इस मदमस्त शायरी का लुफ्त उठाते रहे। पेश है जगजीत सिंह साब की आवाज़ में -



हजारों ख्वाहिशें ऐसी के हर ख्वाइश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यूँ मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-बा-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
[खुल्द : Paradise]

भरम खुल जाए जालिम तेरे क़ामत की दराजी का
अगर इस तुर्रा-ऐ-पुरापेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
[क़ामत : stature; तुर्रा : ornamental tassel worn in the turban; पेच--ख़म : curls in the hair]

मगर लिखवाये कोई उसको ख़त तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रक्खर कलम निकले

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-अशामी
फिर आया वो ज़माना जो जहाँ से जाम-ऐ-जम निकले
[मनसूब : association; बादाशामी : related to drinks]

हुई जिनसे तवक्को खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी जियादा खस्ता-ऐ-तेग-ऐ-सितम निकले
[तवक्को : expectation; तेग : sword]

मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

ज़रा कर जोर सीने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले जो दिल निकले तो दम निकले

खुदा के वास्ते परदा न काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले

कहाँ मैखाने का दरवाजा 'ग़ालिब' और कहाँ वायज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले

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ज़िक्र उस परीवश का

Tuesday, September 16, 2008

नज़्म : मिर्जा ग़ालिब

ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयां अपना
बन गया रकीब आख़िर था जो राज़दां अपना
[परीवश : fairy; रकीब : enemy; राज़दां : friend]

मय वो क्यों बहुत पीते बज्म-ऐ-गैर में यारब
आज ही हुआ मंजूर उन को इम्तिहान अपना

मंज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से इधर होता काश के मकान अपना

दे वो जिस कदर जिल्लत हम हँसी में टालेंगे
बारे आशना निकला उनका पासबान अपना

दर्द-ऐ-दिल लिखूँ कब तक? जाऊं उन को दिखला दूँ
उंगलियाँ फिगार अपनी खामाखूँचाकान अपना
[फिगार : wounded; खाम : immature; खामाक्हूँ : young blood]

घीसते घीसते मिट जाता आप ने अबस बदला
नंग-ऐ-सजदा से मेरे संग-ऐ-आस्तां अपना

ता करे न गमाजी, कर लिया है दुश्मन को
दोस्त की शिकायत में हम ने हम-ज़बान अपना

हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ 'ग़ालिब' दुश्मन आसमान अपना
[दाना : wise; यकता : unique]

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ये न थी हमारी किस्मत

Monday, September 15, 2008

नज़्म - ग़ालिब

ये न थी हमारी किस्मत के विसाल-ऐ-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता

तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना
के खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

तेरी नाज़ुकी से जाना की बंधा था अह्दबोदा
कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तवार होता
[उस्तवार : firm]

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ऐ-नीमकश को
ये खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
[नीमकश=half]

ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता, कोई गमगुसार होता
[नासेह : councellor; चारासाज़ : healer]

रग-ऐ-संग से टपकता वो लहू की फिर न थमता
जिसे गम समझ रहे हो ये अगर शरार होता

गम अगरचे जानगुसिल है, पे कहाँ बचें के दिल है
गम-ऐ-इश्क गर न होता, गम-ऐ-रोज़गार होता
[जान्गुलिस : life threatning ]

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब-ऐ-गम बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों न गर्क-ऐ-दरिया
न कभी जनाजा उठता, न कहीं मजार होता
[गर्क : sink]

उसे कौन देख सकता की यगना है वो यकता
जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो चार होता
[यगना : kinsman, यकता : matchless, दुई : duality ]

ये मसाइल-ऐ-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख्वार होता
[मसाइल=topics, तसव्वुफ़=mysticism, वली=friend, बादाख्वार=drinker]

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बाज़ीचा-ऐ-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे

Wednesday, September 10, 2008

बाज़ीचा-ऐ-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
[बाज़ीचा--अत्फाल = child's play]

इक खेल है औरंग-ऐ-सुलेमान मेरे नज़दीक
इक बात है एजाज़-ऐ-मसीहा मेरे आगे
[औरंग = throne; एजाज़ = miracle]

जुज़ नाम नहीं सूरत-ऐ-आलम मुझे मंजूर
जुज़ वहम नहीं हस्ती-ऐ-आशिया मेरे आगे
[जुज़ = other than; आलम = world; आशिया = things]

होता है निहां गर्द में सेहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे
[निहां = hidden; गर्द = dust, सेहरा = desert, जबीं = forehead]

मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख के क्या रंग है तेरा मेरे आगे

सच कहते हो खुदबीन-ओ-खुदारा हूँ न क्यों हूँ
बैठा है बुत-ऐ-आईना सीमा मेरे आगे
[खुदबीन = proud/arrogant, खुदारा = self adorer, बुत--आईना = lover's mirror; सीमा = particularly]


फिर देखिये अंदाज़-ऐ-गुलफ़शानी-ऐ-गुफ्तार
रख दे कोई पैमाना-ऐ-सहबा मेरे आगे
[गुलफ़शानी = to scatter flowers while speaking, सहबा = wine]

नफरत का गुमाँ गुज़रे है मैं रश्क से गुज़रा
क्यों कर कहूँ लो नाम ना उस का मेरे आगे
[गुमाँ = suspicion/doubt; रश्क = envy]

ईमान मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे
[कुफ्र = impiety, कलीसा = church/cathedral]

आशिक हूँ पे माशूक्फरेबी है मेरा काम
मजनूं को बुरा कहती है लैला मेरे आगे

खुश होते हैं पर वस्ल में यूं मर नहीं जाते
आई शब-ऐ-हिजरां की तमन्ना मेरे आगे
[hijr = separation]

है मौजज़न इक कुल्ज़ुम-ऐ-खून काश! यही हो
आता है अभी देखिये क्या-क्या मेरे आगे
[मौजज़न = turbulent (as in waves), कुल्ज़ुम = sea, खून = blood]

जो हाथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे
[जुम्बिश = movement; सागर-ओ-मीना = glass of wine]

हमपेशा-ओ-हम्माशाराब-ओ-हमराज़ है मेरा
'ग़ालिब' को बुरा क्यों कहो अच्छा मेरे आगे

-ग़ालिब
इस नज़्म को मिर्जा ग़ालिब Drama में जगजीत सिंह ने बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में गाया है -

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हर एक बात पे कहते हो तुम की तू क्या है

Monday, September 8, 2008

हर एक बात पे कहते हो तुम की तू क्या है
तुम्हीं कहो के ये अंदाज़-ऐ-गुफ्तगू क्या है

न शोले में ये करिश्मा न बर्क में ये अदा
कोई बताओ की वो शोख-ऐ-तुन्दखू क्या है

[तुन्दखू - Acrimony, बर्क - Lightening]

ये रश्क है की वो होता है हमसुखन हमसे
वगरना खौफ-ऐ-बदामोजी-ऐ-अड़ क्या है
[रश्क=jealousy;
आमोज़ी=teaching; अदू=enemy]

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जेब को अन हाजत-ऐ-रफू क्या है
[पैराहन=dress; हाजत=need; रफू=darning]

जला हिया जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अजीज़
सिवाए बादा-ऐ-गुलफाम-ऐ-मुश्कबू क्या है
[बहिश्त=heaven; बादा=wine; गुलफाम=delicate, मुश्कबू=the smell of musk]

पियूँ शराब अगर खुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-कडाह-ओ-कूजा-ओ-सुबू क्या है
[खुम=wine barrel, कडाह=goblet, सुबू=wine pitcher ]

रही न ताक़त-ऐ-गुफ्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरजू क्या है
[गुफ्तार=speech]

बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगरना शहर में "ग़ालिब" की आबरू क्या है
-ग़ालिब

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है बस कि हर इक उनके इशारे में निशाँ और

Thursday, September 4, 2008

है बस कि हर इक उनके इशारे में निशाँ और
करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमान और

या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात
दे और दिल उनको जो न दे मुझको जुबां और

आबरू से है क्या उस निगाह-ए-नाज़ को पैबंद
है तीर मुक़र्रर मगर उसकी है कमान और

तुम शहर में हो तो हमें क्या गम जब उठेंगे
ले आयेंगे बाज़ार से जाकर दिल-ओ-जान और

हर चाँद सुबुकदस्त हुए बुतशिकनी में
हम हैं तो अभी राह में है संग-ए-गिरां और

है खून-ए-जिगर जोश में दिल खोल के रोता
होते कई जो दीदा-ए-खूँनाबाफिशां और

मरता हूँ इस आवाज़ पे हर चाँद सर उड़ जाए
जल्लाद को लेकिन वो कहे जाए कि हाँ और

लोगों को है खुर्शीद-ए-जहां ताब का धोका
हर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग-ए-निहां और

लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैन
करता जो न मरता कोई दिन आह-ओ-फुगाँ और

पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नाले
रुकती है मेरी ताबा तो होती है रवां और

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयान और

-ग़ालिब

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क्या मिलेगा यहाँ ?

यहाँ आपको मशहूर शायरों की बेहतरीन नज़में पढने को मिलेंगीइस जगह का मकसद उन बेशुमार नगीनों पे ज़िक्र करना और उनको बेहतर तरीके से समझना हैजहाँ भी मुमकिन है, वहाँ ग़ज़ल को संगीत के साथ पेश किया गया है

बेहतरीन

जब हम चले तो साया भी अपना न साथ दे
जब तुम चलो, ज़मीन चले आसमान चले
जब हम रुके साथ रुके शाम-ऐ-बेकसी
जब तुम रुको, बहार रुके चांदनी रुके
-जलील मानकपुरी

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