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शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो

Monday, October 20, 2008

नज़्म - फिराक़ गोरखपुरी
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो
बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो

ये सुकूत-ए-नाज़, ये दिल की रगों का टूटना
खामोशी में कुछ शिकस्त-ए-साज़ की बातें करो

निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशान, दास्तान-ए-शाम-ए-ग़म
सुबह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो

हर राग-ऐ-दिल वज्द में आती रहे दुखती रहे
यूं ही उस के जा-ओ-बेजा नाज़ की बातें करो

कूछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा
कुछ फ़िज़ा, कुछ हसरत-ए-परवाज़ की बातें करो

जिसकी फ़ुरक़त ने पलट दी इश्क़ की काया फ़िराक़
आज उसी ईसा नफ़स दमसाज़ की बातें करो

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गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं

नज़्म - फिराक़ गोरखपुरी
गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं
आप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं

वाकई तेरे इस अन्दाज को क्या कहते हैं
ना वफ़ा कहते हैं जिस को ना ज़फ़ा कहते हैं

हो जिन्हे शक, वो करें और खुदाओं की तलाश
हम तो इन्सान को दुनिया का खुदा कहते हैं

तेरी सूरत नजर आई तेरी सूरत से अलग
हुस्न को अहल-ए-नजर हुस्न नुमां कहते हैं

शिकवा-ए-हिज्र करें भी तो करें किस दिल से
हम खुद अपने को भी अपने से जुदा कहते हैं

तेरी रूदाद-ए-सितम का है बयान नामुमकिन
फायदा क्या है मगर यूं जो जरा कहते हैं

लोग जो कुछ भी कहें तेरी सितमकोशी को
हम तो इन बातों अच्छा ना बुरा कहते हैं

औरों का तजुरबा जो कुछ हो मगर हम तो फ़िराक
तल्खी-ए-ज़ीस्त को जीने का मजा कहते हैं

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कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम

नज़्म - फिराक़ गोरखपुरी
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम
उस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम

रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गये
वाह री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम
[ग़फ़्लत : Carelessness]

होश की तौफ़ीक़ भी कब अहल-ए-दिल को हो सकी
इश्क़ में अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम
[तौफ़ीक़ : Divine Guidance, Help]

बेनियाज़ी को तेरी पाया सरासर सोज़-ओ-दर्द
तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम
[बेनियाज़ी : Independence]

भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती
उस को भी अपनी तबीयत का समझ बैठे थे हम

हुस्न को इक हुस्न की समझे नहीं और ऐ 'फ़िराक़'
मेहरबाँ नामेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम

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सकूत-ऐ-शाम मिटाओ बहुत अँधेरा है

Wednesday, September 17, 2008

नज़्म : फिराक़ गोरखपुरी

सकूत-ऐ-शाम मिटाओ बहुत अँधेरा है
सुखन की शमा जलाओ बहुत अँधेरा है
[सकूत : silence]

दयार-ऐ-गम में दिल-ऐ-बेकरार छूट गया
संभल के ढूढने जाओ बहुत अँधेरा है

ये रात वो के सूझे जहाँ न हाथ को हाथ
खयालो दूर न जाओ बहुत अँधेरा है

लातों को चहरे पे डाले वो सो रहा है कहीं
ज़या-ऐ-रुख को चुराओ बहुत अँधेरा है
[ज़या : radiance]

हवाएं नीम शबी हों की चादर-ऐ-अंजुम
नक़ाब रुख से उठाओ बहुत अँधेरा है
[नीम शबी : midnight; चादर--अंजुम : sheet of stars]

शब-ऐ-सियाह में गुम हो गई है राह-ऐ-हयात
क़दम संभल के उठाओ बहुत अँधेरा है

गुज़श्ता अहद की यादों को फिर करो ताज़ा
बुझे चिराग जलाओ बहुत अँधेरा है
[गुज़श्ता : past]

थी एक उचकती हुई नींद जिंदगी उसकी
फिराक़ को न जगाओ बहुत अँधेरा है
[उचकती : disturbed]

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सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं

Monday, September 15, 2008

नज़्म - फिराक गोरखपुरी

सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं
लेकिन इस तर्क-ऐ-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं

यूं तो हंगामे उठाते नहीं दीवाना-ऐ-इश्क
मगर ए दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं

मुद्दतें गुज़रीं तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

ये भी सच है के मोहब्बत में नहीं मैं मजबूर
ये भी सच है के तेरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं

दिल की गिनती न यगानों में न बेगानों में
लेकिन इस जल्वागाह-ऐ-नाज़ से उठाता भी नहीं

बदगुमान हो के मिल आई दोस्त जो मिलना है तुझे
ये झिझकते हुए मिलना कोई मिलना भी नहीं

शिकवा-ऐ-जोर करे क्या कोई उस शोख से जो
साफ़ कायल भी नहीं साफ़ मुकरता भी नहीं

मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ए दोस्त
आह मुझसे तो मेरी रंजिश-ऐ-बेजान भी नहीं

बात ये है की सुकून-ऐ-दिल-ऐ-वहशी का मक़ाम
कुंज-ऐ-ज़िन्दाँ भी नहीं वुसा'अत-ऐ-सेहरा भी नहीं
[कुंज--जिन्दान=prison; वुसा'अत=expanse]

मूँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते, के 'फिराक'
है तेरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं

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बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं

नज़्म - फिराक़ गोरखपुरी

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ए जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

मेरी नज़रें भी ऐसे कातिलों का जान-ओ-ईमान है
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं

तबियत अपनी घबराती है जब सुन-सान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

ख़ुद अपना फैसला भी इश्क में काफी नहीं होता
उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं

जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का
इबारत देख कर जिस तरहा मानी जान लेते हैं

तुझे घाटा न होने देंगे कारोबार-ऐ-उल्फत में
हम अपने सर तेरा ए दोस्त हर एहसान लेते हैं

हमारी हर नज़र तुझसे नयी सौगंध खाती है
तो तेरी हर नज़र से हम नया पैगाम लेते हैं

'फिराक़' अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफिर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं

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ए जज्ब-ऐ-निहां और कोई है के वही है

नज़्म - फिराक़ गोरखपुरी

ए जज्ब-ऐ-निहां और कोई है के वही है
खिलवत-कदा-ऐ-दिल में आवाज़ हुई है
[जज्ब--निहां : Hidden Attraction; खिलवत : Solitude; कदा : House]

कह दे तो ज़रा सर तेरे दामन में छिपा लूँ
और यूं तो मुक़द्दर में मेरे बे-वतनी है

वो रंग हो या बू हो के बाद-ऐ-सहरी हो
ए बाग़-ऐ-जहाँ जो भी यहाँ है सफारी है

ये बारिश-ऐ-अनवर ये रंगीनी-ऐ-गुफ्तार
गुल-बारी-ओ-गुल-सिरी-ओ-गुल-पैराहनी है

ए जिंदगी-ऐ-इश्क मैं समझा नहीं तुझ को
जन्नत भी जहन्नुम भी ये क्या बूलाजबी है

है नुत्क जिसे चूमने के वास्ते बेताब
सौ बात की इक बात तेरी बे-सखुनी है

मौजें हैं मय-ऐ-सुर्ख कि या खाट-ऐ-दहन हैं
लब है कि कोई शोला-ऐ-बर्क-ऐ-अम्बी है

जागे हैं "फिराक़" आज गम-ऐ-हिजरां में ता-सुबह
आहिस्ता से आ जाओ अभी आँख लगी है

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अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं

नज़्म - फिराक़ गोरखपुरी

अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं, यूं ही कभू लब खोले हैं
पहले "फिराक़" को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं

दिन में हम को देखने वालो अपने अपने हैं औकात
जाओ न तुम इन खुश्क आंखों पर हम रातों को रो ले हैं

फितरत मेरी इश्क-ओ-मुहब्बत किस्मत मेरी तन्हाई
कहने की नौबत ही न आई हम भी कसू के हो ले हैं

बाग़ में वो ख्वाब-आवर आलम मौज-ऐ-सबा के इशारों पर
डाली डाली नौरस पत्ते सहस सहज जब डोले हैं

उफ़ वो लबों पर मौज-ऐ-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंदें
हाय वो आलम जुम्बिश-ऐ-मिज़गां जब फिटने पर तोले हैं

इन रातों को हरीम-ऐ-नाज़ का इक आलम होए है नदीम
खल्वत में वो नर्म उंगलियाँ बंद-ऐ-काबा जब खोले हैं
[हरीम : House; खल्वत : solitude; बंद--काबा : buttons of the dress]

गम का फ़साना सुनाने वालो आख़िर-ऐ-शब आराम करो
कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं

हम लोग अब तो पराये से हैं कुछ तो बताओ हाल-ऐ-"फिराक़"
अब तो तुम्हीं को प्यार करे हैं अब तो तुम्हीं से बोले हैं

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ये तो नहीं के गम नहीं

नज़्म - फिराक गोरखपुरी

ये तो नहीं के गम नहीं
हाँ मेरी आँख नम नहीं

तुम भी तो तुम नहीं हो आज
हम भी तो आज हम नहीं

अब न खुशी की है खुशी
गम का भी अब तो गम नहीं

मौत अगरचे मौत है
मौत से जीस्त कम नहीं

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क्या मिलेगा यहाँ ?

यहाँ आपको मशहूर शायरों की बेहतरीन नज़में पढने को मिलेंगीइस जगह का मकसद उन बेशुमार नगीनों पे ज़िक्र करना और उनको बेहतर तरीके से समझना हैजहाँ भी मुमकिन है, वहाँ ग़ज़ल को संगीत के साथ पेश किया गया है

बेहतरीन

जब हम चले तो साया भी अपना न साथ दे
जब तुम चलो, ज़मीन चले आसमान चले
जब हम रुके साथ रुके शाम-ऐ-बेकसी
जब तुम रुको, बहार रुके चांदनी रुके
-जलील मानकपुरी

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