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तुम्हारी मस्त नज़र अगर इधर नहीं होती

Saturday, October 4, 2008

नज़्म - साहिर लुधिआनवी
तुम्हारी मस्त नज़र अगर इधर नहीं होती
नशे में चूर फ़िज़ा इस कदर नहीं होती

तुम्हीं को देखने की दिल में आरजूए हैं
तुम्हारे आगे ही और ऊंची नज़र नही होती

ख़फ़ा न होना अगर बढ़ के थाम लूं दामन
ये दिल फ़रेब ख़ता जान कर नहीं होती

तुम्हारे आने तलक हम को होश रहता है
फिर उसके बाद हमें कुछ ख़बर नहीं होती

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मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे

The famous nazm by Sahir Ludhianvi in which he is telling his beloved to meet him at any place but Taj Mahal as Taj reminds him of his poorness. He feels that only emperor can afford to build such monuments to show off their love, but the love of a poor can be equally deep. I love the style in which he says "मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे" !

ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उलफत ही सही
तुम को इस वादी-ए-रँगीं से अक़ीदत ही सही
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे

बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी
सब्त जिस राह पे हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उलफत भरी रूहों का सफर क्या मानी

मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तशरीर-ए-वफ़ा
तूने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली,
अपने तारीक़ मक़ानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिये तश्शीर का सामान नहीं
क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारत-ओ-मक़ाबिर, ये फ़ासिले, ये हिसार
मुतल-क़ुलहुक्म शहँशाहों की अज़्मत के सुतून
दामन-ए-दहर पे उस रँग की गुलकारी है
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का ख़ून

मेरी महबूब! उनहें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सानाई ने बक़शी है इसे शक़्ल-ए-जमील
उनके प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूद
आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़ँदील

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा, ये महल
ये मुनक़्कश दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहँशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे

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सोचता हूँ की मुहब्बत से किनारा कर लूँ

Tuesday, September 16, 2008

नज़्म : साहिर लुधियानवी

सोचता हूँ की मुहब्बत से किनारा कर लूँ
दिल को बेगाना-ऐ-तरगीब-ओ-तमन्ना कर लूँ
[तरगीब : inspiration]

सोचता हूँ कि मुहब्बत है जुनून-ऐ-रुसवा
चाँद बेकार-से बेहूदा ख्यालों का हुजूम
एक आजाद को पाबन्द बनाने की हवस
एक बेगाने को अपनाने की साईं-ऐ-मौहूम
[साईं--मौहूम : illusionary effort]

सोचता हूँ कि मुहब्बत है सुरूर-ऐ-मस्ती
इसकी तनवीर में रौशन है फजा-ऐ-हस्ती

सोचता हूँ कि मुहब्बत है बशर की फितरत
इसका मिट जाना, मिटा देना बहुत मुश्किल है
सोचता हूँ कि मुहब्बत से है ताबिंदा हयात
आप ये शमा बुझा देना बहुत मुश्किल है
[बशर : man; ताबिंदा : lighted; हयात : life]

सोचता हूँ कि मुहब्बत पे कडी शर्तें हैं
इक तमद्दुन में मसर्रत पे बड़ी शर्तें हैं
[तमद्दुन : culture]

सोचता हूँ कि मुहब्बत है इक अफ़सुर्दा सी लाश
चादर-ऐ-इज्ज़त-ओ-नामूस में कफनाई हुई
दौर-ऐ-सरमाया की रौंदी हुई रुसवा हस्ती
दरगाह-ऐ-मज़हब-ओ-इखलाक से ठुकराई हुई
[अफ़सुर्दा : disappointment]

सोचता हूँ कि बशर और मुहब्बत का जुनून
ऎसी बोसीदा तमद्दुन से है इक कार-ऐ-ज़बूँ
[कार--ज़बूँ : bad deed]

सोचता हूँ कि मुहब्बत न बचेगी ज़िंदा
पेश-अज-वक़्त की साद जाए ये गलती हुई लाश
यही बेहतर है कि बेगाना-ऐ-उल्फत होकर
अपने सीने में करूं जज्ब-ऐ-नफ़रत की तलाश
[पेश-अज-वक़्त : time preceding now]

और सौदा-ऐ-मुहब्बत से किनारा कर लूँ
दिल को बेगाना-ऐ-तरगीब-ओ-तमन्ना कर लूँ
[सौदा--मुहब्बत : madness of love]

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तंग आ चुके हैं कशमकश-ऐ-जिंदगी से हम

साहिर साहब की लिखी हुयी यह नज्म फ़िल्म प्यासा में रफी साब ने बहुत खूबसूरती से गायी है। मौक़ा था कॉलेज Reunion का और हमारे बरबाद शायर (Played by गुरु दत्त साब) घूमते घामते कहीं से पहुँच गए, सबने कुछ न कुछ तेहरीर की और जब गुरु दत्त साब को कुछ कहने की जिद की गयी तो उन्होंने यह नज़्म सुनायी -

तंग आ चुके हैं कशमकश-ऐ-जिंदगी से हम
ठुकरा ना दें जहाँ को कहीं बेदिली से हम

मायूसी-ऐ-माल-ऐ-मोहब्बत ना पूछिये
अपनों से पेश आए हैं बेगानगी से हम
[माल=consequence]

लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ऐ-उम्मीद
लो अब कभी गिला ना करेंगे किसी से हम

उभरेंगे एक बार अभी दिल के वल-वले
गो दब गए हैं बार-ऐ-गम-ऐ-जिंदगी से हम

गर जिंदगी में मिल गए फिर इत्तफाक से
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम

अल्लाह रे फरेब-ऐ-मसहीयत के आज तक
दुनिया के ज़ुल्म सहते रहे खामोशी से हम

हम गम-ज़दा हैं लाये कहाँ से खुशी के गीत
देंगे वही जो पायेंगे इस जिंदगी से हम

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अहल-ऐ-दिल और भी हैं

Friday, September 12, 2008

नज़्म : साहिर लुधियानवी

अहल-ऐ-दिल और भी हैं अहल-ऐ-वफ़ा और भी हैं
एक हम ही नहीं दुनिया से खफा और भी हैं

क्या हुआ गर मेरे यारों की ज़बानें चुप हैं
मेरे शाहिद मेरे यारों के सिवा और भी हैं
[शाहिद : witness]

हम पे ही ख़त्म नहीं मसलक-ऐ-शोरीदासरी
चाक-ऐ-दिल और भी है चाक-ऐ-काबा और भी हैं
[मसलक--शोरीदासरी : rebellious ways; काबा : long gown]

सर सलामत है तो क्या संग-ऐ-मलामत की कमी
जान बाकी है तो पैकान-ऐ-काजा और भी हैं
[मलामत : accusations; पैकान : arrow; काजा : death]

मुंसिफ-ऐ-शहर की वहदत पे न हर्फ़ आ जाए
लोग कहते हैं के अरबाब-ऐ-जफा और भी हैं
[वहदत : unity]

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कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

Wednesday, September 3, 2008

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है...

के जिंदगी तेरी जुल्फों की नर्म छाओं में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी जीस्त का मुक़ददर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

अजब न था के मैं बेगाना-ऐ-आलम हो कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खोया रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीम-बार आँखें
इन्हीं हसीं फसानों में माहो रहता

पुकारतीं मुझे जब तल्खियां ज़माने की
तेरे लबों से हलावत के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बराहना-सर, और मैं
घनेरी जुल्फों के साए में छुप के जी लेता

मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तेरा गम, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह जिंदगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरजू भी नहीं

ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी गुज़ार राहों से
मुहीब साए मेरी सिम्ट बढाते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुर होल खाराज़ारों से

न कोई जादा न मंजिल न रोशनी का सुराग
भटक रही है खालाओं में जिंदगी मेरी
इन्हीं खालाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हम-नफस मगर यूं ही

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
-साहिर

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क्या मिलेगा यहाँ ?

यहाँ आपको मशहूर शायरों की बेहतरीन नज़में पढने को मिलेंगीइस जगह का मकसद उन बेशुमार नगीनों पे ज़िक्र करना और उनको बेहतर तरीके से समझना हैजहाँ भी मुमकिन है, वहाँ ग़ज़ल को संगीत के साथ पेश किया गया है

बेहतरीन

जब हम चले तो साया भी अपना न साथ दे
जब तुम चलो, ज़मीन चले आसमान चले
जब हम रुके साथ रुके शाम-ऐ-बेकसी
जब तुम रुको, बहार रुके चांदनी रुके
-जलील मानकपुरी

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