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एक बस तू ही नहीं मुझसे खफा हो बैठा

Friday, September 12, 2008

नज़्म : फरहत शहजाद

एक बस तू ही नहीं मुझसे खफा हो बैठा
मैं ने जो संग तराशा वोह खुदा हो बैठा

उठ के मंजिल ही अगर आए तो शायद कुछ हो
शौक़-ऐ-मंजिल में मेरा आबलापा हो बैठा
[आबलापा : Blisters]

मसलहत छीन गई कुव्वत-ऐ-गुफ्तार मगर
कुछ न कहना ही मेरा मेरी सदा हो बैठा
[मसलहत : Wisdom; कुव्वत : Strength; गुफ्तार : Conversation]

शुक्रिया ऐ मेरे कातिल ऐ मसीहा मेरे
ज़हर जो तूने दिया था वो दवा हो बैठा

जाने 'शहजाद' को मिनजुम्ला-ऐ-आदा पाकर
हूक वो उट्ठी के जी तन से जुदा हो बैठा
[मिनजुम्ला--adaa : Half Hearted, हूक : Shooting Pain]

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लुत्फ़ जो उसके इंतज़ार में है

नज़्म : फरहत शहजाद

लुत्फ़ जो उसके इंतज़ार में है
वो कहाँ मौसम-ए-बहार में है।

हुस्न जितना है गाहे-गाहे में
कब मुलाकात बार-बार में है।

जान-ओ-दिल से मैं हारता ही रहूँ
गर तेरी जीत मेंरी हार में है।

ज़िन्दगी भर की चाहतों का सिला
दिल में पैवस्त मू के ख़ार में है।
[मू : Hair; ख़ार : A linen covering for a woman’s head, throat, and chin]

क्या हुआ गर खुशी नहीं बस में
मुसकुराना तो इख़्तियार में है।

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खुली जो आँख तो वो था न वो ज़माना था

नज़्म : फरहत शहजाद

खुली जो आँख तो वो था वो ज़माना था
दहकती आग थी तन्हाई थी फ़साना था

ग़मों ने बाँट लिया मुझे यूं आपस में
के जैसे मैं कोई लूटा हुआ खजाना था

ये क्या के चंद ही क़दमों पे थक के बैठ गए
तुम्हें तो साथ मेरा दूर तक निभाना था

मुझे जो मेरे लहू में डुबो के गुज़रा है
वो कोई गैर नहीं यार एक पुराना था

खुद अपने हाथ से "शहजाद" उस को काट दिया
के जिस दरख्त के टहनी पे आशियाना था

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क्या मिलेगा यहाँ ?

यहाँ आपको मशहूर शायरों की बेहतरीन नज़में पढने को मिलेंगीइस जगह का मकसद उन बेशुमार नगीनों पे ज़िक्र करना और उनको बेहतर तरीके से समझना हैजहाँ भी मुमकिन है, वहाँ ग़ज़ल को संगीत के साथ पेश किया गया है

बेहतरीन

जब हम चले तो साया भी अपना न साथ दे
जब तुम चलो, ज़मीन चले आसमान चले
जब हम रुके साथ रुके शाम-ऐ-बेकसी
जब तुम रुको, बहार रुके चांदनी रुके
-जलील मानकपुरी

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