आओ फ़िर नज़्म कहें ...
Wednesday, September 3, 2008
आओ फ़िर नज़्म कहें
फिर किसी दर्द को सहला के सुजा ले ऑंखें
फिर किसी दुखती रग से छुआ दे नश्तर
या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर
एक बार नाम लेकर किसी हमनाम को आवाज़ ही दे ले
फिर कोई नज़्म कहें
-गुलज़ार
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